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♦ संतपथ वारीयज्ञ ♦

कृत,त्रेता,द्रापर अने किलयुगमां धर्मनुं स्वरूप जे ते युग धर्म प्रमाणे जुदु जुदु होय छे. आ उक्ति मुजब सदगुरु ईमामशाहे चतुर्युगनो जे युगधर्म बताव्यो छे ते टूंकमां नीचे प्रमाणे छे.

कृतयुगमां ऋग्वेद प्रधान होवाथी तमाम धर्माचार ऋग्वेद मुजब थता ऋग्वेदनो वर्ण लाल छे ते वखते उतर दीशा महत्वनी मानवामां आवती हती तेथी लोको उतर तरफ मोढुं राखी ऋग्वेदी गायत्री मंत्रनो जाप करता.कृत युगमां सदगुरु ब्रह्मदेव सृष्टि गुरु हता अने भकत प्रल्हाद हतो.सुवर्णनो पाट एटले के सिहासन स्थापन करी तेना उपर सुवर्ण कलश मुकवामां आवतो अने ऋग्वेदी मंत्रमुजब घटपाट पूजा अने यज्ञिविध करता.सत्पंथमां आ घटपाट पूजा विधीनो खास करीने समवेश छे.कारण घटने ठेकाणे बधा देवीदेवताओनो वास छे.कलश स्थापनना मंत्रमां कहयुं छे के कलशना मुखस्थाने विष्णु,कंठस्थाने शिव,मूलस्थाने ब्रह्मदेव छे.मध्यभागे मातृगण रहेला छे.तेमनी कुकमां एटले अंदर सप्तसमुद्र सपृद्रीपोसह पृथ्वी,ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद,अथर्ववेद पोतपोताना अंगोसह रहेला छे.अहीं शांती अने पुस्टी दायक गायत्री सावित्री ते पापनाशक देवता पूजा माटे आवे छे.गंगा,यमुना, गोदावरी,सरस्वती ,नर्मदा,सिंधु ,कावेरी आ जळमां आवी स्थित रहे.वरूणने नमस्कार हो.गंधाक्षता सुंगधी फूलो एमने अर्पण करूं छुं एम कही फूलो कलशने चडाववा.अंदरनुं जळ तुळसीपत्रथी अथवा आचमनीथी पूजा साहित्य उपर छाटवुं.आ प्रमाणे कलशपूजा एटले वरूणदेवनी स्थापना करी लोको जयोति स्वरूपनुं ध्यान करता अने ते वखते शरीरमां वायुतत्वनो भाग वधु प्रमाणमां होवाथी लोको मृतदेहने जंगलमां छोडी देता तेथी ए वायुतत्वमय देह वायुमां विलीन थतो.ए शरीरनी जरापण दुर्गध आवती नही.आ रीतना अंतेष्टि संस्कारने वनदाग कहे छे.आ रीतनो युगधर्म कृतयुगमां पाळवामां आवतो.

त्रेतायुगमां महिर्ष वशीष्ठ ए सदगुरु युगगुरू हता. तेमणे बतावेलो युगधर्म टूंक मां आ प्रमाणे छे.यजुर्वेद प्रमाणभूत अने पूर्विदशा महत्वनी छे तेथी पूर्विदशा तरफ म्हों राखी लोको यजुर्वेदी गायत्री मंत्रनो जाप करता.चांदीना सिहासन उपर चांदीना कलशनी स्थापना करता.यजुर्वेदी मंत्र प्रमाणे जाप करता.ते वखते रामावतार प्रमुख होवाथी श्रीरामनुं नामस्मरण थतु.महिर्ष वशीष्ठ युगगुरू अने भकत राजा हरीचंद्र हतो.रवीवारना दिवसे चौदस होय तो अनंत चतुर्दशीनुं व्रत महत्वनुं मानवामां आवतुं.त्रेतायुगमां शरीरमां जलतत्व वधारे होवाथी मृतदेहनुं पाणीमां विसर्जन करता तेथी देह पाणीमां विलीन थतो.आ अंतेष्टि विधीने जलदाग कहेता त्रेतायुगमां आवो युगधर्म आचरणमां हतो.

पछी द्रापरयुगमां वेदमूर्ति व्यास ए युगगुरू हता.तेमणे द्रापरयुगनो जे युगधर्म बताव्यो तप आ प्रमाणे हतो. सामवेदने दिक्षण दिशा महत्वनी होवाथी दिक्षण तरफ म्हों राखी लोक सामवेदी गायत्री मंत्रनो जाप करता. तांबानां सिहासन उपर तांबानो कळश स्थापी सामवेदी मंत्र मुजब घटपाट पूजाविधीथी जयोतिस्वरूप ध्यान करी कृष्ण अवतारनुं नामस्मरण करता.सदगुरु व्यास ए युगगुरू अने पांडव ए भकत हता. सोमवती अमासना व्रतनुं पालन करवुं श्रेष्ठ मनातुं.शरीरमां अिग्नतत्व वधारे होवाथी मृतदेहने चंदनना लाकडाथी अग्निदाह करता.बळती वखते ए दुर्गंधी रहेती नही.आ अंतेष्टि विघीने अग्निदाह कहे छे. आम द्रापर युगनो युगधर्म हतो.

कृतयुगमां ब्रह्मदेवे जे युगधर्म कहयो तेमां परिस्थती मुजब थोडो फेरफार करी युगगुरू वशीष्ठे त्रेतायुगनो धर्म कहयो अने त्यार पछी तेमां पण समय मुजब फेरफार करी द्रापरयुगमां वेदमूर्ति व्यासजीए कहयो अने तेमां परिस्थतीनुसार फेरफार करी कलीयुगमां सदगुरु ईमामशाह महाराजए युगधर्म कहयो ते नीचे प्रमाणे छे.

कलीयुगमां अथर्ववेद, प्रमाणभूत मान्यो छे जे सर्ववेदोमां श्रेष्ठ छे.अथर्ववेदनो योग ते यज्ञपुरूषनुं मस्तक छे.एटले ते योग श्रेष्ठ अने महत्वनो छे. ऋग्वेदनो भाग तेनुं गळुं अने भुजा वच्चेनुं अंग छे. सामवेदथी यज्ञपुरूषनुं ह्यदय अने पाछलो भाग निमार्ण थयेल छे.आ पछी बाकी रहेलो भाग यजुर्वेदनो छे. ते द्रारा यज्ञपुरूषनुं पेट ते उपरनो भाग किटप्रदेश,जंघा अने चरण विगेरे शेष शरीरनी क९पना करवामां आवी छे. ते दिव्यरूप अने मायायुकत पुरूष अगर अशीनाशी तुरीय पदेथी प्रगट थयेल छे.आथी यज्ञपुरूषनुं मस्तक जेनाथी बन्युं छे, जेमां विशिष्ट प्रकारनो ध्यानयोग कहेलो छे ते आ अथर्ववेद छे.अथर्ववेदनो मूळ अर्थ एवो छे के अथर्वा एटले निश्चळ. थर्व एटले चंचळता. जीवात्मानी ईन्द्रीयो चंचळ होय छे पण तेनाथी पण मन अित चंचळ होय छे. आ चंचळ मनने निश्चळ बनाववानी अने ह्य्दयमां आत्मानो शोध लेवानी विद्या जेमां कही छे ते ज अथर्ववेद.तेने ब्रह्मवेद एम पण कहे छे.आवो अथर्ववेद कळीयुगमां प्रमाणभूत मानवामां आव्यो छे. अने तेथी ज सदगुरु ईमामशाह महाराजे आ अथर्ववेदथी ज आपणने श्रेष्ठ एवो घटपाट पूजाविधि बताव्यो छे. आ विधि करवामां जे मंत्र बोलाय छे ते बधायमंत्र अथर्ववेद उपरथी ज ईमामशाहमहाराजे करेला छे. पूजा विधिना समये घटपाटनी स्थापना करी चोख्खा घीनी त्रण जयोत करवी.आ त्रण जयोति रज,सत्व,तम आ त्रण गुणोना अनुक्रमे ब्रह्मा,विष्णु,महेश देवताना प्रतीकरूपे छे.पूजाना वखते आ त्रण जयोतिनी ध्यानधारणा करी गुरू पासेथी मळेला मंत्रथी स्मरण करी मनमां त्रणे जयोति एक साथे जोवी.आ प्रमाणे एकरूप थवाथी सत्व,रज,तम ए त्रण गुणना बदले एक ज शुद्ध सत्वांश गुण रहे छे तेज प्रणवरूपे पूर्ण परब्रह्म छे. अने तेनु ज दर्शन थाय छे. साक्षात्कार थाय छे.ते ज सत् तेज प्रणवस्वरूप एटले ॐ ए पूर्ण अक्षर ब्रह्मथी ओळखाय छे.ॐ कार ज परमात्मानी प्राप्ति माटे सर्वश्रेष्ठ मार्ग छे.सर्वश्रेष्ठ साधन छे.आ परम रहस्य जाणी श्रद्धा अने प्रेमथी जे परमतत्व उपर निर्भर रहे छे तेने परमेश्वरनी प्राप्ति खात्रीथी थाय छे.ईमामशाह महाराजे कहयुं छे के परमात्मा परमशांत अने अद्वैत छे. अने एने एकाग्र करी परब्रह्मनु एटले ज जयोतिस्वरूपनुं नित्य ध्यान धरवुं के जेथी तेने हजारो सूर्य जेवा तेजस्वी परमसुखदायी एवा परमेश्वरनुं दर्शन थशे. परमिवशुद्ध जयोतिमां तेनी आत्माजयोत एकरूप थई माणस लक्षचोर्याशीना फेरामांथी मुकत थशे.आ प्रमाणे परमात्मा साथे तद्रप थवुं ए जीवननुं आद्यकर्तव्य छे.तेनी पूर्ति माटे श्रेष्ठ श्रद्धा होवी जोईए.सत्यवस्तु उपरनी श्रद्धा शुभ फळ आपनारी होय छे.आ प्रमाणे अथर्ववेदना मंत्रमां एक महान दिव्य शक्ति छे अने घटपूजा विधी अथर्ववेदना ज मंत्रथी ज थाय छे तेथी दिव्यशिकत भरेला मंत्रथी पूजाना स्थळे अंतिरक्षना अनंत करोडी देवीदेवताओनुं आवाहन करवामां आवे छे.

ॐ नमो श्री निष्कलंकी नारायणय जनादॅनाय, भस्मा यूधाय विद् महे दिव्य नैत्राय धिमही, तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात-तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात ॐ शांतिः शांतिः शांतिः     


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