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♦ संतपथ तत्वज्ञान ♦

वैदिक सनातन सत्पंथ संप्रदायमें एकं सत निर्गुण निराकार सर्वज्ञ सर्व व्यापक सत-चित-आनंद स्वरुप ईश्वरकोही पूज्य याने उपास्य माना है | आद्यनारायण याने सगुन साकार ईश्वर, आद्यशक्ति याने अनादीसिद्ध महाशक्ति प्रकृति, त्रिगुणात्मक तत्व याने ब्रम्हा, विष्णु, महेश यह सनातन सत्पंथके मुख्य पंचायतन है | सृष्टिचक्रचालक देवता याने सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, अर्यमा, कुबेर, यमधर्मं , धन्वन्तरी यह मानव के अलग अलग क्षेत्रके मुख्य अधिष्टाता देवगण है | श्रीगणेश, बारा आदित्य, अष्ट वासु, एकादश रूद्र अश्विनीकुमार मरुत्गन एवं मुल प्रकृतिके अलग-अलग विग्रह अम्बाजी, दुर्गा, महाकाली, अन्नपुर्णा, गायत्री, लक्ष्मी, सरस्वती यह सनातन सत्पंथ के उत्कृष्ट देव देवता गण है | सभी देव्तओंका आवाहन पूजन, नैवेद्य अर्पण, आहुति अर्पण सत्पंथ घाटपाट कलश पूजा के माध्यम से वारीयज्ञ या अग्नियज्ञ के रूपसे किया जाता है | पितृयान और देवयान मार्गमें से देवयान मार्ग को ही प्राधान्य दिया जाया है |

मानव जीवन उन्नति के लिए सभी देव-देवताओंकी उपासना, कर्म, भक्ति, ज्ञान प्राप्ति तो करनी ही पड़ती है | जीवात्मा यह परमात्मा का ही अंश है | अविद्या-अज्ञान के प्रभाव से कर्म बंध में बद्ध हुआ यह जीवात्मा अपने को स्वयं परमात्मासे अलग मनाता है | परन्तु कर्ममुक्ति के बाद यह अपने मुलस्वरुप परमात्मा में विलीन हो जाता है | जीवात्मा के कर्म बंध ज्ञान प्राप्ति से नष्ट हो जाते है | योग्य अधिकारी एवंम गुरु के मार्ग दर्शन से साधना करके अविद्या का नाश होता है | ज्ञान सूर्य उदित होने से कर्तुत्वभिमान, ममत्व, मायाबंध सहज भाव से नष्ट होते है और जीव शिवरूप बन जाता है | जीवात्मा ने पुण्य कर्म किया तो उसीको स्वर्गीय सुख प्राप्त होता है |

तीर्थयात्रा, स्नान, दान, नाम स्न्मरण, योगाभ्यास, व्रत, उपासना एवं माता-पिता-गुरु-संत आदि का सत्संगसे जीवात्मा की बाह्यशुद्धि, शारीरिक शुद्धि होती है | परन्तु पुण्यकर्मोसे, सत्कर्म करने से ही मन शुद्धि प्राप्त होती है | और मनुष्य जीवात्मा निरिच्छ बुद्धि से कर्म करने से मुक्त हो जाता है | सत्पंथमें चार आश्रमोंको मान्यता है | लेकिन जन्म से कोई भी व्यक्ति ब्राम्हण या शुद्र नाही होता है | अपने गुण कर्मो से वो स्वयं शुचिर्भुत होता है |

पंच महायज्ञनोकी आवश्यकताए हर एक गृहस्थोको होती है | -
१) ब्रम्हयज्ञ - ब्रम्हज्ञानी महापुरुषोंका ध्यान, चिंतन, स्मरण एवं उपासना करना |
२) देवयज्ञ - देव देवताओंकी उपासन एवं पूजा अर्चना करना |
३) पितृयज्ञ - वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध, माता-पिता, गुरु की सेवा करना |
४) पशुयज्ञ - गाय, श्वान, पशु, पंछी, विधवा, अनाथ, विकलांग आदि का संगोपन |
५) अतिथियज्ञ - विद्वान-संत, महापुरुषोंकी सेवा तथा सन्मान करना |

मनुष्य का जीवन उन्नत होने हेतु बालपन से ही उसको शरीर, मन एवं आत्मा को सुसंस्कारी बनाना आवश्य है | इसीलिए नामकरण, मंत्र ग्रहण, संस्कारयुक्त शिक्षा लेना आवश्यक होता है | आज के युग में इस संस्कृति की विस्मरण से ही अराजकता एवं लैंघिकता बढ़ी है | सत्पंथ यही ज्ञान मार्गका सत्य ज्ञान एवं सत तत्वज्ञान की शिक्षा प्रदान करत है और यही निष्काम भाव से एवं शुभ कर्म से ईश्वर उपासना कर जीवात्मा मुक्त होता है |

ॐ नमो श्री निष्कलंकी नारायणय जनादॅनाय, भस्मा यूधाय विद् महे दिव्य नैत्राय धिमही, तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात-तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात ॐ शांतिः शांतिः शांतिः     


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