प. पू. आचार्य श्री जनार्दन महाराज की वेबसाइट पर आपका सहर्ष स्वागत है
♦ सतपंथ स्वरुप ♦

(૧) दृढ निश्चय :-

(अ) सत्य : वाणी और आचरणमें हरहंमेश सत्य निष्कपट वृत्ति और मृदुभाषी बने ।

(आ) पुरुषाथ : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ।
(१) धर्म : वेदोक्त मार्ग का यथाशक्ति आचरण करे ।
(२) अर्थ : स्वाश्रय और प्रमाणिकता से धनोपार्जन करें । यह सात्विक संपति है । अन्याय, जुल्म और अन्य बुरे कार्य से प्राप्ति कि हुई संपति का उपभोग करनेवाला व्यक्ति हीन होता है । इसलिये न्याय और नीति से धन प्राप्त करना चाहिये ।
(३) काम : विषय वासना और क्षणीक उपभोगमे प्रवृत्त न रहे । वासनाओं पर संयम रखें । इन्द्रियों को काबूमें रखे ।
(४) मोक्ष : वेदोक्त मुक्ति मार्ग की साधनानुसार आचरण करके, मुक्ति का अंतिम ध्येय प्राप्त करने में प्रयत्नशील रहें । ऐसा व्यवहार करने से ही मानव जन्म की सार्थकता होगी । अन्यथा मानवी और पशुमें कोई अंतर न होगा ।

(ई) प्रेम : यह संसार में मानव मात्र समान है । इसलिये हरेकके साथ मन, वचन और कर्म से विनम्र होकर प्रेम-स्नेह से व्यवहार करना चाहिये । प्रेम से करुणा जागृत होती है । और करुणा ही दया का पर्यायी भाव है । जो धर्म का मुल तत्व भी है ।

(उ) समानभाव : मानवमात्र के अंतर मे ऐक ही आत्मा है । ऐसा आत्मौपज्य भाव रखना चाहिये । हम सब एक ही ईश्वर के संतान है । कोई छोटा नहीं, कोई बडा नहीं । ऐसी विशाल दृष्टि रखकर सबके साथ बंधुत्व भावसे रहना चाहिये ।

(ए) अहिंसा : सत्पंथ मार्ग में अहिंसा एक महान तत्व है । पशु पक्षी और अन्य प्राणीको मारने से हिंसा होती है । इतना ही नहीं, मार कहने से या किसी की भावनाओ का खंडन करने पर भी हिंसा होती है । और नैतिक अध:पतन होता है ।

(ऐ) परोपकार : सन्मार्गे पर चलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को सहाय करने के लिये हंमेश तत्पर रहना चाहिये । शुद्ध भावना और निष्काम वृति से दु:खी जनोकी सेवा करना और मानव कल्याण की भावना राखनी चाहीये । सत्पुरूषो की सेवा करना अपना परम कर्तव्य समझना ।

(औ) क्षमा : क्षमा वीर भुषणमः यह उक्ति स्मंरण में रखते हुए शत्रु हो या कष्ट पीडा पहुचाने वाले को भी क्षमा करना शुभ लखन है ।

(२) प्रतीज्ञा :

(अ) सत्पंथमे निर्देश की गई सभी प्रतिग्ना का अक्षरशः पालन करना । सदगुरु श्री ईमामशाह महाराजने व्यवहार में कर्तव्यपालन और धर्म कार्य मे कैसा आचरण राखना चाहीये, इस संबंधमे जो नियम - पालन का निर्देश किया है, उसका अनुसरण करना ।

(आ) बालकों को सतपंथ की शिखवण एंम उपदेश से ज्ञात रखकर अपने संतानो को धर्म का शिक्षण देना अति आवश्यक है । जिससे धार्मिक संस्कृति संरक्षित रहेगी ।

(ई) धार्मिक बातोमें चमत्कार या अंधश्रद्धा को दुर करके ज्ञान द्रिष्ट का ही अवलंधन करना चाहीये । जिससे अज्ञानताका भय दुर होगा । वेद, उपनिषदो, सत्शास्त्रो और सदगुरु वचन पर दृढश्रद्धा एंव विश्वास रखना परम कर्तव्य है ।

(३) नियम :

(अ) शरीर शुद्धि : लाईसुतक याने स्पर्शा-स्पर्श (वुद्धि -जनन शौच) स्त्री को प्रसुता होने के बाद सवामास याने ४० दिन और गोत्र जनोको ११ दिन तक सूतक याने स्पर्शा-स्पर्श का पालन करना चाहीए । मृत्यु-सुतक गोत्रजनो को ११ दिन तक रखना चाहीये । रजस्वला ४ दिन तक किसी भी चीज का स्पर्श न करे । स्नान शौचादि विषय में शास्त्रा-नुसार आचरण करे । सदगुरू वचना-नुसार तीर्थ मंत्रोपचारादि से शुद्ध बने ।

(आ) अंतर शुद्धि : मादक एंम नशीले पदार्थ याने लहसुण, प्याज, हिंग, तम्बाकु, अफीण, गांजा, भांग, ताडी, मांस- मदिरा जैसी निषेद्ध चीज वस्तुओका सेवन न करे । क्योंकी ऐसे पदार्थो का सेवन करने से शरीर को हानी पहूंचती है । प्रभु भक्ति करनेसे परावृत हो सकते है । सुद, सवाई, सुद औरपरस्त्री गमन - चिंतन से भी मनुष्य में हीनता आती है, आत्मा की शक्ति लुप्त हो जाती है । और आसुरी वृति बढती है । यह महापाप से मनुष्य का अध:पतन होता है । इसलीये शास्त्रो में निषेध माने गये पदार्थो का त्याग करके सात्विक अन्न और पदार्थो का सेवन करें इसके एक स्वरुप आत्मा एंम ह्यदय की शुद्धि होती है । मन - अंतर प्रभु स्मरण में तल्लीन रहता है । और दैवी संपति आविर्भाव होता है ।

(ई) व्रत : युगधर्मानुसार प्रत्येक मासकी शुकल द्वितिया और शुक्रवार के दिन जो दुज आती है, (जिसको थावर दूज का महाव्रत कहते है,) उस दिन व्रत रखें । दसवंत, सूकृत, पुण्यतिथी, श्राद्धा, उतरकार्य, पिंडश्राद्ध आदि सतपंथ की पूजाविधि अनुसार करें । महाशिवरात्री, रामनवमी, गोकूलाष्टमी, गुरूपूर्णिमा , दुर्गापूजा (नवरात्री), गणेशचतुर्थी, दिपावली, एकादशी, चौदस, अमावास्या आदि तिथी-त्यौंहारों का व्रत रखें ।

(ई) उपासना : प्रणव ॐ कार मंत्र का ध्यान चिंतन करना और सतपंथ के वचनानुसार वरूणदेव वारियज्ञ घटपाट पूजा करे ।

(उ) ध्येय : कळलियुगके अंतमें प्रगट होनेवाले दशमा अवतार आद्य विष्णु श्री निष्कलंकी नारायण और आद्यसकती माता और प्रणव मंत्र ॐ आराध्य देव मानना ।

ॐ नमो श्री निष्कलंकी नारायणय जनादॅनाय, भस्मा यूधाय विद् महे दिव्य नैत्राय धिमही, तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात-तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात ॐ शांतिः शांतिः शांतिः     


Website Designed & Developed By - JIYAL CHAUDHARI(MUMBAI) - 08976882324
hit counter