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♦ परिचय - प. पू. आचार्य श्री. जनार्दन महाराज ♦

पुज्यश्री जनार्दन महाराज का जन्म २८/८/१९७८ को महाराष्ट्र के संभाजी नगर (औरंगाबाद) जिले के सिल्लोड तालुका स्थित अनद गाँव में हुआ | बचपन से ही शांतिप्रिय एवं तेजस्वी रहे महाराज सभी मित्रो में प्रिय थे | "छत्रपति शिवाजी की तरह हम भी सभी एक होकर अपने देश, धर्म एवं भगवन हेतु कार्य करे" ऐसी भावना उनके मन से वाणीरूप होकर निकलती थी | गाव के हनुमान मंदिर पर सभी बच्चो समवेत पुज्यश्री का बलोपासना एवं ज्ञान चर्या का काल बिताता गया | सभी मित्रो में "रामदास" (पुर्वाश्रम के पुज्यश्री का नाम) प्रिय थे | तथा वे सभी से सामान रूप से प्रेम एवं स्नेह करते थे | पाठशाला का ज्ञान लेने के साथ ही बाल्यकाल से रामायण, महाभारत, गीता, वेद, उपनिषिद, इतिहास इनका भी अभ्यास चलता रहा | इसी तरह "स्वर्णिम बचपन" बिताता जा रहा था, और समय की गति बढ़ती गयी |

११ वर्ष की आयुमें पुज्यश्री फैजपुर मंदिर आये और पुज्यश्री जगन्नाथ महाराज के कृपापात्र शिष्य बने | अपने मृदु एवं शांत स्वभाव के कारण वे सभी में घुल मिल गये | अपने इस प्रिय शिष्य को जीबन के जटिल समस्याओके विषय पर सत्पंथ के ज्ञान आधारपर लोगो को मार्गदर्शन करते देख पू. जगन्नाथ महाराजजी बहुत ही आनंदित होतो थे | साधना-समर्पण से सत् पंथ के हर उत्तरदायित्व को निभाकर उनका प्रयास जारी रहा | उनके इस समर्पण भाव को देख २२ दिसंबर १९९७ को संतकृपा आश्रम, फैजपुर के १२ वे गादीपति चुने गए | पूज्य जगन्नाथ महाराज के जाने से जो रिक्तता निर्माण हुई वह पुज्यश्री ने अपने कार्य, कर्तुत्वोंसे भर दी | यौवनावस्था, तेजस्वी मुद्रा, शांत एवं स्नेहपूर्ण स्वभाव सत्पंथ के साथ साथ हिंदी, मराठी, गुजराथी तथा अन्य संत साहित्य का चिंतन अभ्यास यो साधना से अनुभूत होकर शिष्यों को तृप्ती शांति और समाधान देने की कला यह सभी के चलते वे सत्पंथ एवं युवावर्ग के ह्रदय सम्राट बन गये | अखंड प्रवास, गुरुपर नि:स्सीम श्रद्धा, कड़ी मेहनत, लोकसंग्रह से उन्होंने अनोखा "ह्रदय संगम" प्रस्थापित किया | पहले पहले फैजपुर से दूर रहनेवाले कच्छ, भुज, गुजरात के लोगो ने अब इस युवा सन्यासी के कार्य से प्रभावित होकर उसे अपने ह्रदय में बड़े सन्मान से विराजित किया | कार्यक्षेत्र विस्तृत होने से दूरदूर से सत्संग-प्रवचन हेतु पुज्यश्री को बुलावा आने लगे | मराठी के साथ-साथ अन्य प्रादेशिक भाषाओँ में भी पुज्यश्री की भाव गंगा श्रोताओं को सुस्नान करने लगी |

धर्मप्रचार-प्रसार हेतु उन्होंने महारष्ट्र, गुजरात मध्यप्रदेश सहित विदेश (लंदन, बोस्टन, वालसोल, लेस्टर इ.) में भी यात्रा की है | आचार्य जनार्दंजी महाराज द्वारा - सत्पंथ स्नेह मिलन समारोह, दिव्य संगीतमय श्रीमद दशावतार कथा, ब्र. गुरुवर्य जगन्नाथजी महाराज पुण्यतिथि महोत्सव, गाव-गाव बाल-बालिका संस्कार शिबिर, स्कुलोंमें, महाविद्यालायोमें जाकर संस्कार, संस्कृति और व्यसंमुक्तिपर मार्गदर्शन शिबिर जैसे कई उपक्रम शुरू किये गए है | सनातन सत्पंथ का सर्वव्यापी प्रचार-प्रसार यही महाराज का जीवन ध्येय बन गया है |

ॐ नमो श्री निष्कलंकी नारायणय जनादॅनाय, भस्मा यूधाय विद् महे दिव्य नैत्राय धिमही, तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात-तन्नो ज्वरहर प्रचोदयात ॐ शांतिः शांतिः शांतिः     


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